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23 April 2015

मुहम्मद ग़ोरी

मुहम्मद गौरी का पुरा नाम शहाब-उद-दीन मुहम्मद ग़ोरी था। १२वीं शताब्दी का अफ़ग़ान सेनापति था । उसने अपने भाई ग़ियास-उद-दीन ग़ोरी (जो उस समय सुलतान था) के लिए भाारत में ग़ोरी साम्राज्य का बहुत विस्तार किया और उसका पहला आक्रमण मुल्तान (1175 ई.) पर था। पाटन (गुजरात) के शासक भीम द्वितीय पर मोहम्मद ग़ौरी ने 1178 ई. में आक्रमण किया किन्तु मोहम्मद ग़ौरी बुरी तरह पराजित हुआ।

मोहम्मद ग़ौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच तराईन के मैदान में  युद्ध हुए। 1191 ई. मे हुए तराईन के प्रथम युद्ध मे पृथ्वीराज चौहान की विजय हुई किन्तु अगले ही वर्ष 1192 ई. मे 18 वी वार पृथ्वीराज चौहान को तराईन युद्ध में मोहम्मद ग़ौरी ने बुरी तरह पराजित किया।  

गौरी ने  इस युद्ध से पहले पृथ्वीराज की जासूसी करवाई थी। वह जासूस आैर उसके साथी अजमेर में फकीर के वेश में रहे थे। बाद में पता चलने पर अजमेर के लोगो ने उसे मार दिया था। वही आज श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। वहा पर आज भी रस्म चालु होने से पहले गौरी परिवार का झण्डा चढाया जाता है। यह एक बहुत बडा  प्रमाण है।

गौरी द्वारा पृथ्वीराज को बंदी बनाकर अफगानिस्तान ले जाया गया और उनके साथ धोर अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया  गया। गौरी ने यातना स्वरुप पृथ्वीराज की आंखे निकलवा ली और ढाई मन वजनी लोहे की बेटियों में जकडकर एक धायल शेर की भांति कैद में डलवा दिया।  
गौरी यह भुल गया की 17 वार पराजित होने के बाद भी पृथ्वीराज चौहान ने उसके साथ कोई भी अत्याचार नहीं किया था बल्कि उसे एक राजा की हैसीयत से उसकी इज्जत कर उसे छोड दिया था।
इसके परिणाम स्वरुप मुस्लिम शासन की स्थापना हुई और हजारो क्षत्राणिययों ने पृथ्वीराज की रानियों के साथ अपने मान मर्यादा की रक्षा हेतु चितारोण कर अपने प्राण त्याग दिये। 

पृथ्वीराज ने शब्द भेदी बाणा चला कर उसके ही दरबार में गौरी को मार डाला।
पृथ्वीराज और चंद्रवरदाई ने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार एक दूसरे को कटार मार कर अपने प्राण त्याग दिये।  इस प्रकार मुहम्मद गौरी का 1192 में अन्त हो गया।

मुहम्मद ग़ोरी का कोई बेटा नहीं था और उसकी मौत के बाद उसके साम्राज्य के भारतीय क्षेत्र पर उसके प्रिय ग़ुलाम क़ुतुब-उद-दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत स्थापित करके उसका विस्तार करना शुरू कर दिया। उसके अफ़ग़ानिस्तान व अन्य इलाक़ों पर ग़ोरियों का नियंत्रण न बच सका और ख़्वारेज़्मी साम्राज्य ने उन पर क़ब्ज़ा कर लिया। ग़ज़ना और ग़ोर कम महत्वपूर्ण हो गए और दिल्ली अब क्षेत्रीय इस्लामी साम्राज्य का केंद्र बन गया। 


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