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05 April 2015

नेहरु खानदान कौन है आैर उसकी असिलयत

  पार्ट -1

शुरुआत नेहरु के पड-दादाओं से ........    
राजकौल जिसका नाम गंगु था। गंगू ने गद्दारी कर के  सिखों के गुरु गोविन्द सिंह के बेटों को औरंगजेब के हवाले कर दिया था, इस कारण हिन्दु और सिंख गंगू को तलाश रहे थे। अपनी जान बचाने के लिए गंगू कश्मीर से भागकर देहली आ गया। वहा पर औरगजेब के वंशज फरुख्शियर से मिला वही गंगू ने इस्लाम कबूल किया और उसे बदले में उसे नहर के पार कुछ जमीन दे दी और तलाश रहे से बचाव का वचन दिया।

राजकौल की दुसरी औलाद जिसका नाम गियासुदीन गाजी रख दिया था यही गियासुदीन मोतीलाल का बाप था !   ब्रिटीश के समय में जिसके भी तार मुगलों से जुडे हुए थे उन पर भी ब्रिटीश हुकुमत की गाज गिरी। इस दौरान गियासुदीन ने हिन्दु नाम गंगाधर अपना लिया। नहर के पास रहने के कारण अपना सरनेम नेहरु रख लिया।
लेखक के.एन.राव  “द नेहरू डायनेस्टी” में  लिखते हैं…. कि जवाहरलाल, मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे और मोतीलाल के पिता का नाम था गंगाधर था।

मोतीलाल के पिता गंगा धर थे, ठीक वैसा ही जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत (बहादुरशाह जफर के समय) में नगर कोतवाल थे। 

इतिहासकारों ने खोजा तो पाया कि बहादुरशाह जफर के समय दो नायब कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ, जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे, लेकिन किसी गंगाधर नाम के व्यक्ति का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला (मेहदी हुसैन की पुस्तक बहादुरशाह जफर और १८५७ का गदर, १९८७ की आवृत्ति), रिकॉर्ड मिलता भी कैसे, क्योंकि गंगाधर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर से डर कर बदला गया था, असली नाम तो था गयासुद्दीन गाजी।

सारी दुनिया में नेहरु सरनेम का कोई भी व्यक्ति नहीं मिलेगा ?  कशमीरी पंडित होने का नाटक किया है,  अगर कशमीरी पंडित थे तो आज कशमीर के पंडितों को कशमीर से भागना नहीं पडता। अपनी जाती का तो थोडा ख्याल रखतें।

एम. के सिंह कि पुस्तक  “ Encyclopedia of Indian War of Independence “ ( ISBN : 81-261-3745-9) के 13 वे संस्करण में लेखक ने इसका विस्तार से उल्लेख किया है, लेकिन भारत सरकार हमेशा से इस तथ्य को छिपाती रही है।

जवाहरलाल ने अपनी आत्म कथा में कहा है कि उसने अपने दादा की एक तस्वीर देखी है जिसमें उसके दादा ने एक मुगल ठाकुर की तरह कपडे पहने है और चित्र में दिखाई देता है कि दाढी रखते थे मुस्लिम टोपी पहने हुए थे और उनके हाथ में दो तलवारे लिए हुए थे। जवाहरलाल ने यह भी लिखा कि उसके दादा और परिवार को अंग्रजों ने हिरासत में लिया था असली कारण का उल्लेख कभी नहीं किया।

जवाहर लाल का जन्म -     जवाहर लाल का जन्म 77 मीरगंज इलाहाबाद के एक वेश्यालय में हुआ था। इलाहाबाद में बहुत लम्बे समय तक वो इलाका वेश्यावृति के लिए प्रसिद्ध रहा है। यह ऐरीया मुगल काल से ही था। बाद में मोतीलाल ने लाली जान नाम कि एक वेश्या को कुछ हिस्सा बचे दिया था। जिसका नाम बाद में इमाम-बाडा पडा।

कई भरोसेमंद स्त्रोत व Encyclopedia.com  और विकिपीडिया भी इस बात की पुष्टी करते है।

बाद में मोतीलाल अपने परिवार के साथ आनंद भवन में रहने आ गए।  इस प्रकार से जवाहरलाल का पैतृक घर तो हुआ परन्तु जवाहर लाल का जन्म स्थान नहीं।

(पुस्तक -नेहरु खान वंश,प्रकाशक-मानव रक्षा संघ ) ने अपने लेख में प्रमाणित कर लिखा है की मोतीलाल (वेश्यालय मालिक) व नेहरू व नेहरू  का जन्म वेश्यालय में हुआ था। 

कम उम्र में विवाह के बाद जीविका की खोज में वह इलाहबाद आ गया था आैर मीरगंज में रहा। मोतीलाल अपनी दूसरी पत्नी के साथ मीरगंज में वेश्याओं के इलाके में रहा था। पहली पत्नी एक पुत्र के होने के बाद मर गयी थी।  कुछ दिन पश्चात उसका पुत्र भी मर गया .जिसके बाद वह कश्मीर लोट गया। वहा पर एक बार फिर तीसरा विवाह किया और तीसरी पत्नी के साथ फिर से इलाहबाद लोट आया।

जीविका चलने के लिए वेश्यालय चलने  का निश्चय किया।  दिन के समय मोतीलाल कचहरी में मुख्तार का काम करता था।  उसी उच्च न्यायलय में एक प्रसिद्द वकील मुबारक अली था जिसकी वकालत बहुत चलती थी।  इशरत मंजिल के नाम से उसका एक मकान था। 

मुबारक अली भी शाम को रंगीन बनाने के लिए मीरगंज आता रहता था. एक दिन मीरगंज में ही मोतीलाल मुबारक अली से मिला और अपनी नई पत्नी के साथ रात बिताने का निमंत्रण दिया। सोदा पट गया, और इस प्रकार मोतीलाल के सम्बन्ध मुबारक अली से बन गए।

दोनों ने इटावा की विधवा रानी को उसका राज्य वापस दिलाने के लिए जमकर लूटा उस समय लगभग १० लाख की फीस ली  और आधी आधी बाँट ली।  

यही से मोतीलाल की किस्मत का सितारा बदल गया। इसी बीच मोतीलाल की बीबी गर्भवती हो गयी।मुबारक ने माना की बच्चा उसी की नाजायज ओलाद है।

मोतीलाल ने मुबारक से भावी संतान के लिए इशरत महल में स्थान माँगा,किन्तु मुबारक ने मना कर दिया, किन्तु जच्चा-बच्चा का सारा खर्च वहन किया,अंत में भारत का भावी प्रधान मंत्री मीरगंज के वेश्यालय में पैदा हुआ।जैसे ही जवाहर पी एम् बना वैसे ही तुरंत उसने मीरगंज का वह मकान तुडवा दिया और अफवाह फैला दी की वह आनद भवन (इशरत महल)में पैदा हुआ था जबकि उस समय आनंद भवन था ही नहीं।

अवध के नवाब को जब पता चला की मुबारक का एक पुत्र मीरगंज के वेश्यालय में पल रहा है तो उसने मुबारक पर दबाब बना कर इशरत महल लाने को कहा। इस प्रकार से जवाहरलाल की परवरिश इशरत महल में हुई।                                                                                                                                     
                                                                                                       पार्ट 2                          
जवाहरलाल  का चरित्र 
                                                                                                                              


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