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13 June 2017

जम्मू-कश्मीर में अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए अब्दुल्ला परिवार किसी भी हद तक जा सकता है। देश के नेताआें ने क्या किया

अब्दुल्ला परिवार चुनाव जीतने के लिए अच्छी तरह जानता था कि ऐसा यह तभी संभव हो सकता है, जब आतंकियों की भाषा में बात की जाए। इसके लिए ..

नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुखिया अपना और अपनी पार्टी का रुख स्पष्ट करने में जुट गए जिसके साक्ष्य - 
  • पिता-पुत्र मतदान से चार दिन पहले चुनाव प्रचार के दौरान श्रीनगर के गली-कूचों में घोषणा कर रहे थे कि पत्थर फेंकने वाले अपने वतन कश्मीर के लिए प्राण न्योछावर कर रहे हैं
  • फारुख अब्दुल्ला ने पत्थरबाजों का हौसला बढ़ाते हुए हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री को ललकारा और कहा, ‘‘आपको कश्मीर में पर्यटकों की चिंता होगी, लेकिन हमारे नौजवानों को इसकी फिक्र नहीं है। ये भूखे रहकर जान दे सकते हैं, पर अपने वतन कश्मीर के लिए पत्थरबाजी बंद नहीं करेंगे। इन्होंने खुदा से वादा किया है कि ये अपने वतन कश्मीर को आजाद कराने के लिए प्राण तक न्योछावर कर देंगे।
  • कश्मीर के युवा अब मौत से बेपरवाह हो गए हैं। उन्होंने बंदूकें थाम ली हैं, विधायक-सांसद बनने के लिए नहीं, बल्कि कश्मीर की आजादी के लिए। साथ ही, भारत को चुनौती दी ...
  • कश्मीर हिन्दुस्थान की खानदानी जायदाद नहीं है जो वह इस पर अपना दावा ठोकता रहता है।
  • इस खानदान ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर पर भी भारत के दावे को चुनौती दी और कहा, साथ ही कहा कि हिम्मत है तो पाकिस्तान से वह इलाका छुड़ा कर दिखाओ। 
  • फारुख ने अलगाववादी नेता सैयद अहमद शाह गिलानी की गोद में बैठकर हुर्रियत की शान में कसीदे काढ़े और पार्टी के चम्मचों को हुर्रियत के साथ मिलकर चलने का आदेश भी दिया।
  • उसने सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकने वालों को ‘आजादी का योद्धा’ कहना शुरू कर दिया

अब सवाल उठता है कि -
  • क्या इन आतंकियों के साथ नेशनल कॉन्फ्रेंस की मिलीभगत है?
  • आतंकियों से संबंध के सारे साक्ष्य मौजुद होने के बाद भी आज तक जांच क्यों नहीं की गई ?
 
9 अप्रैल की घटना
उस दिन मतदान होना था और अर्द्धसैनिक बल के कुछ जवान मतदान केंद्रों की सुरक्षा में तैनात थे। 
एक मतदान केंद्र "बड़गाम जिले" पर स्थिति बिगड़ गई और स्थानीय अधिकारियों के लिए इसे संभालना मुश्किल हो गया। उग्र भीड़ ने मतदान केंद्र को घेर लिया था। पत्थरबाज वहां तैनात थे। करीब 1200 लोगों की उग्र भीड़ पेट्रोल बमों से केंद्र को जलाने की कोशिश में थी। चारों तरफ से पथराव भी हो रहा था। वहां मौजूद कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों की जान खतरे में थी। उन्हें व अन्य नागरिको को सही सलामत निकालने के लिए सेना की सहायता मांगी गई। 
असम के मेजर लीतुल गोगोई के नेतृत्व में सैनिकों की एक टुकड़ी जब तक वहां पहुंची, स्थिति गंभीर हो चुकी थी। मेजर गोगोई के सामने चुनौती की घड़ी थी मेजर गोगोई को तत्काल ऐसा रास्ता निकालना था जिससे बिना खून-खराबे के हालात पर नियंत्रण पाया जा सके।  जो कुछ करना था, उन्हें ही करना था और वह भी तत्काल। 

फारुख अब्दुल्ला अपने कार्यकर्ताओं से हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के साथ मिलकर आजादी के लिए संघर्ष करने की हिदायत दे चुका था। इसलिए पत्थरबाजों की भीड़ में उनके कार्यकर्ता कितने थे, इसका अनुमान लगाना मुश्किल था। ये कार्यकर्ता दोहरी भूमिका के लिए तैयार खड़े थे। उन्हें वोट भी डालना था और पत्थर भी फेंकने थे। 
सहसा मेजर गोगोई के मन में एक विचार कौंधा। उन्होंने पत्थरबाजों को उकसा रहे एक युवक को पकड़ा, जो सेना की जीप के पास पहुंच गया था। उसका नाम फारुख अहमद डार था। हालांकि उसने भागने की कोशिश की थी। मेजर के कहने पर जवानों ने उसे पकड़कर जीप के बोनट पर बैठा दिया। ऐसा करते ही पत्थरबाजी बंद हो गई। 

सोचने लायक है एेसा क्यों हुआ -
भीड़ में से आतंकियों द्वारा गोली चलाने का खतरा भी टल गया, क्योंकि ऐसा करने से जीप पर बंधे फारुख की मौत हो सकती थी जो पत्थरबाजों की पलटन का हिस्सा था। इस तरह मेजर गोगोई ने बिना बल प्रयोग किए मतदान केंद्र से सभी को सुरक्षित निकाल लिया। 
इससे हुर्रियत कॉन्फ्रेंस, अलगाववादियों और आतंकियों की रणनीति असफल हो गई। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस, अलगाववादियों नेशनल कॉन्फ्रेंस की योजना विफल होने की बौखलाहट पर ये सभी मेजर गोगोई को इतनी आसानी से सफल कैसे होने दे सकते थे। लिहाजा, सोशल मीडिया का हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने वाली अलगाववादियों की एक ब्रिगेड सक्रिय हो गई और बोनट पर बंधे फारुख अहमद की तस्वीर वायरल कर दी गई। 

मानवाधिकार-वादियों जो की अपने आप को ज्यादा ही बुद्धिजीवी समझते है हमेशा अपराध करने वालो का साथ देना जिसकी फितरत है -

चाहे छत्तीसगढ़ के जंगलों में माओवादियों से लेकर जम्मू-कश्मीर में आतंकियों का साथ देने के लिए मानवाधिकारों की दुहाई दे कर उनकी रक्षा करना, उनके कुकृत्यों की सफाई देने और उसके औचित्य को सही ठहराने की भारी-भरकम जिम्मेदारी इनही मानवाधिकार-वादियों पर है।

पत्थरबाजों को अपना काम करते हुए कुछ हद तक खतरा भी उठाना पड़ता है। वे सुरक्षाबलों की गोली का शिकार हो सकते हैं, लेकिन मानवाधिकार ब्रिगेड के सामने ऐसा कोई खतरा नहीं होता। वे अपने काम को सुरक्षित स्थान और सुविधा सम्पन्न वातावरण में ही अंजाम देते हैं। 

इस ब्रिगेड ने अपनी रणनीति से मेजर गोगोई को घेर लिया। पुलिस ने मेजर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर ली। वहा रे मेरे देश का कानून मानवाधिकार-वादियों का समूह गोगोई को सजा देने की मांग करने लगा। उन्होंने नरसंहार को टाल दिया, यह बात गधे के सिर पर सींग की तरह गायब कर दी।  बोनट पर बंधे फारुख अहमद को कितनी ‘मानसिक वेदना’ हुई, इसका लेखा-जोखा पेश किया जाने लगा
मेजर गोगोई को जिम्मेदार ठहरा जा देने की मांग की  जाने लगी। 

क्या यह मानवाधिकार-वादी देशद्रोही नहीं है ? 
सरकार इन पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा रही है ?

कैसे पलीता पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लगाया  -
उन्होंने न केवल मेजर गोगोई की सराहना की, बल्कि यह भी कहा, " यदि उनके स्थान पर मैं होता तो मैं भी यही करता। आप जम्मू-कश्मीर में सेना को हाथ पीछे बांधकर आतंकवादियों से लड़ने के लिए नहीं कह सकते। "
लेकिन इस पूरी रणनीति को पलीता लग जाएगा, इसकी आशंका किसी को नहीं थी। न पत्थर ब्रिगेड को, न सोशल मीडिया ब्रिगेड और न ही मानवाधिकार ब्रिगेड को। नेशनल कॉन्फ्रेंस को ही तो बिल्कुल भी अनुमान नहीं था, क्योंकि श्रीनगर लोकसभा सीट पर वह कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ रही थी। 
कैप्टन के लेख से मानवाधिकार-वादियों की ब्रिगेड में खलबली मच गई। उन्होंने रणनीति बनाते समय इस अप्रत्याशित हमले की कल्पना तक नहीं की थी। इस नुकसान की भरपाई के लिए अब किसी रुतबे वाले व्यक्ति को उतारना जरूरी हो गया था। 
कैप्टन का मुकाबला न तो सैयद अहमद शाह गिलानी के बयानों से हो सकता था और न ही यासीन मलिक यह काम कर सकता था।
यह पलीता पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लगाया क्योंकि वह खुद देश के रक्षक रहे है

 मानवाधिकार ब्रिगेड के लिए भी संकट की घड़ी उपस्थित हो गई थी। मरता क्या न करता। परदा उठाना पड़ा और कैप्टन को जवाब देने के लिए उमर अब्दुल्ला को मैदान में उतारा गया। 
कैप्टन के आलेख के जबाब में उमर अब्दुल्ला का आलेख अखबारों में आया। उसने मेजर गोगोई पर हमला किया और फारुख अहमद पर हुए जुल्म के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया। उसके लिए मेजर गोगोई को क्या सजा दी जाए? उमर अब्दुल्ला को यह कहने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि इसकी घोषणा अखबार में नहीं, बल्कि कश्मीर घाटी की सड़कों पर पार्टी विधायक शमीमा फिरदौस के नेतृत्व में प्रदर्शन के माध्यम से मेजर गोगोई के अंत की मांग उठाकर की गई थी।      


  • कोई और देश होता तो फारुख अहमद की पृष्ठभूमि की जांच की मांग की जाती परन्तु क्यों नहीं की गई ? 
  • अलगाववादियों से उसके संबंधों पर सवाल उठते परन्तु क्यों नहीं सवाल उठे ? 

लेकिन यहां गोगोई को ही घेरा जा रहा था और फारुख को मासूम बताया जा रहा था। 

मेजर गोगोई का कहना है कि फारुख अहमद पत्थरबाजों का सरगना था और उन्हें इस काम के लिए उकसा रहा था। 

कायदे से तो इस साक्ष्य के आधार पर फारुख के खिलाफ भी मुक्दमा दर्ज होना चाहिए था परन्तु ...
इसके विपरीत मेजर गोगोई के खिलाफ पुलिस में प्राथमिकी दर्ज है। क्या कहने मेरे इस देश के नेताआें आैर उनके चम्मचों के।

उमर अब्दुल्ला और उनकी मानवाधिकार ब्रिगेड चिल्लाती रही कि मेजर गोगोई को फारुख को जीप के बोनट पर नहीं बैठाना चाहिए था, लेकिन यह नहीं बताया कि उस हालत में इसके स्थान पर क्या करना चाहिए था?    

थल सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने बिल्कुल सही प्रश्न उठाया है कि यदि सीमा पर शत्रुओं और देश के भीतर देश के खिलाफ बंदूक उठाने वालों के मन में सेना का भय नहीं रहेगा तो देश का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।   बड़गाम जिले में उस दिन यही हो रहा था।


क्या सेना इस बात की प्रतीक्षा करती कि पहले आतंकवादी गोली चलाते, फिर कुछ सैनिक मारे जाते, तब सेना सक्रिय होती?


सेना को पैलेटगन का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए भी यही मानवाधिकार ब्रिगेड उच्चतम न्यायालय तक दौड़ लगाती रहती है क्यों ?

सेना बंदूक, पैलेटगन नहीं चलाएगी तो सेना उस स्थिति में क्या आतंकियों के मनोरंजन के लिए मनोरंजक कार्यक्रमों का आयोजन करेगी?

नेशनल कॉन्फ्रेंस और पाकिस्तान, दोनों का दुर्भाग्य यह है कि दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू या उनके वंशजों की सरकार नहीं है, यदि ऐसा होता तो शायद सचमुच मेजर गोगोई को ही सजा हो जाती। 

कांग्रेस की सोच देखे -  
कांग्रेसी नेता संदीप दीक्षित ने थलसेना प्रमुख को सडक का गुण्डा कहा। बाद में देश में विरोध होने पर इस कमीने ने खेद जताने आैर अपना बयान वापस नेने के बाद कहा की यह मामला अब खत्म हो चुका है।


भाजपा नेता केन्द्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने बकायदा संवाददात सम्मेलन में दीक्षित के इस बयान पर आपत्ति कर कहा की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सामने आकर माफी मांगनी चाहिए।


किसी भी नेता के मुंह से नहीं फुटा की इसे तत्काल प्रभाव से पार्टी से निकाल देना चाहिए या इसके खिलाफ कोई मुक्दमा दर्ज करना चाहिए।।

क्योंकि नेता नेता भाई-भाई !!
यह है मेरा देश आैर इसके नेता ।।



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धन्यवाद